यूपी
के कुशवाहा समाज के ज्यादा वोटरों वाले इन लोकसभा सीटों पर इनकी एकमत
वोटिंग निर्णायक साबित होंगी जो “मोदी लहर” में बीजेपी को विजयश्री दिला
सकते हैं और अतीत में यहाँ कुशवाहा समाज से जनप्रतिनिधि रहा भी है. हर
लोससभा में औसत 12 लाख होते हैं ----
(1)झाँसी=3,50,000,
(2)अमरोहा=3,48,000, (3)मिर्जापुर=3,45,000, (4)चंदौली=3,05,000,
(5)देवरिया=3,00,000, (6)सलेमपुर=2,98,000, (7)कुशीनगर=2,95,000,
(8)इटावा=2,52,000, (9)एटा=2,50,000, (10)मैनपुरी=2,50,000,
(11)आगरा=2,30,000, (12)फतेहपुर सीकरी=2,30,000, (13)फिरोजाबाद=2,20,000,
(14)फतेहपुर=2,10,000, (15)सुल्तानपुर=2,00,000, (16)बिजनौर=2,00,000,
(17)कन्नौज=2,00,000, (१८)अकबरपुर-अम्बेदकरनगर =2,00,000
(१९)बलिया=2,00,000, (20)मुरादाबाद=1,90,000, (21)फूलपुर=1,80,000,
(22)कानपुर=1,80,000, (23)सीतापुर=1,80,000, (24)वाराणसी=1,70,000,
वैसे सपा द्वारा बाबूसिंह कुशवाहा को साथ लेना उसी स्थिति में फायदेमंद
होगा जब बीजेपी कुशवाहो के प्रतिनिधित्व को नकारती है और बसपा हलाकि बीजेपी
के परंपरागत वोट रहे ब्राह्मणों को रिझाने में लगी है लेकिन उसने विधानसभा
चुनाव में कुशवाहो को 39 सीट से टिकट देकर वोट खीचने की कोशिश किया था.
जातीय गणित में मोदी की टीम मायावती की पितामह है लेकिन यूपी और बिहार में
बीजेपी पर उन लोगो का कब्जा है जो “जातीय नहीं बल्कि स्वजातीय” गणित में
विश्वास करते हैं और यही बीजेपी की आत्मघाती कमजोरी साबित हो सकती है, अमित
शाह इस बार इस बात को संज्ञान में ले रहे हैं, 80 लोकसभा सीटों वाली यूपी
की बीजेपी इकाई में कुशवाहा, यादव, निषाद, राजभर, हरिजन, प्रजापति, कुर्मी,
चौरसिया, नाइ, जैसी जातियों का प्रतिनिधित्व संतोषजनक नहीं है जो वोट
खीचने के लिए जरुरी है.
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