तन्हाई किसी का इंतज़ार नहीं करती
किस्मत कभी बेवफाई नहीं करती
उनसे दूर होने का असर है वरना
परछाई कभी जिस्म पर वार नहीं करती .
मेरे बाद किधर जायेगी तन्हाई..
मैं जो मरा तो मर जायेगी तन्हाई..
मै जब रो-रो के दरिया बन जाउंगा..
उस दिन पार उतर जायेगी तन्हाई..
ये मौसम ए बरसात हमें रास न आया
जो ज़ख़्म हरे होते वही सूखे पड़े हैं
बहने दो मेरे अश्क, कि यादों का है मौसम
सावन मे तो उतरे हुए दरिया भी चढ़े हैं
अपनों को जब अपने खो देते है
तन्हाइयो मे वो रो देते है
क्यों इन पलकों पर बिठाते है लोग उनको
जो इन पलकों को अक्सर आंसुओ से भेगो देते है
किस्मत कभी बेवफाई नहीं करती
उनसे दूर होने का असर है वरना
परछाई कभी जिस्म पर वार नहीं करती .
मेरे बाद किधर जायेगी तन्हाई..
मैं जो मरा तो मर जायेगी तन्हाई..
मै जब रो-रो के दरिया बन जाउंगा..
उस दिन पार उतर जायेगी तन्हाई..
ये जिंदगी तन्हाई को साथ लाती है,
हमें कुछ करने के काबिल बनाती है.
सच है मिलना जुलना बहुत ज़रूरी है,
पर ये तन्हाई ही हमें जीना सिखाती है.
किसी दिन तेरे दिलमें उतर जाऊंगा..
मैं तो लम्हा हूं, तुझे छूके गुज़र जाऊंगा..
तेरी ज़िन्दगी मे कोई रंग भर जाऊंगा..
चल पडा हूं जो, तुझसे मिलकर ही जऊंगा..
कुछ ना किसी से बोलेंगे बस
तन्हाई में चुप -चाप रो लेंगे अब
नींद तो आँखों में आती नहीं
चलो जब मौत आएगी तब जी भर के सो लेंगे .
ता उम्र घर भरते रहे हैं जिस हुनर से लोग,
अब भी लगे हैं बेचने अपने हुनर को लोग|
पीछे खड़ी है फौज बेरोज़गारों की-
उनको भी कुछ दिखाने दें अपने हुनर ये लोग |
गम की परछाईयाँ
यार की रुसवाईयाँ
वाह रे मुहोब्बत ! तेरे ही दर्द
और तेरी ही दवाईयां
किसी दिन तेरे दिलमें उतर जाऊंगा..
मैं तो लम्हा हूं, तुझे छूके गुज़र जाऊंगा..
तेरी ज़िन्दगी मे कोई रंग भर जाऊंगा..
चल पडा हूं जो, तुझसे मिलकर ही जऊंगा..
कुछ ना किसी से बोलेंगे बस
तन्हाई में चुप -चाप रो लेंगे अब
नींद तो आँखों में आती नहीं
चलो जब मौत आएगी तब जी भर के सो लेंगे .
ता उम्र घर भरते रहे हैं जिस हुनर से लोग,
अब भी लगे हैं बेचने अपने हुनर को लोग|
पीछे खड़ी है फौज बेरोज़गारों की-
उनको भी कुछ दिखाने दें अपने हुनर ये लोग |
गम की परछाईयाँ
यार की रुसवाईयाँ
वाह रे मुहोब्बत ! तेरे ही दर्द
और तेरी ही दवाईयां
ये मौसम ए बरसात हमें रास न आया
जो ज़ख़्म हरे होते वही सूखे पड़े हैं
बहने दो मेरे अश्क, कि यादों का है मौसम
सावन मे तो उतरे हुए दरिया भी चढ़े हैं
अपनों को जब अपने खो देते है
तन्हाइयो मे वो रो देते है
क्यों इन पलकों पर बिठाते है लोग उनको
जो इन पलकों को अक्सर आंसुओ से भेगो देते है
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